अनाथ हुई छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनियां 

 न्यूज़ रिवेटिंग 

 रायपुर, अप्रैल 1 

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सुशासन को सरकार की दो प्रमुख एजेंसियों ने राजधानी रायपुर में गहरा धब्बा लगा दिया है।  

आनन् फानन में छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल (छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड) ने राजधानी स्थित अपनी कुछ कॉलोनियों को रायपुर नगर निगम को सौप दिया। अब स्थिति यह है कि कॉलोनी के रहवासी मूलभूत समस्याओं के निदान के लिए दर दर  की  ठोखरे  खा रहे है।  

दिसंबर माह में हाउसिंग बोर्ड ने अपनी कुछ कॉलोनियों को रायपुर नगर निगम को स्थानांतरित कर दिया। बोर्ड की माली हालत  को  इसके लिए कारण बताया गया जो वास्तविक नहीं है। 

रहवासियों से बोर्ड ने बाकायदा मेंटेनेंस शुल्क लिया है जो करोड़ में है लेकिन उनके अधिकारियो ने रकम बोर्ड के खाते में जमा न कर अपने निजी उपयोग में खर्ज़ कर दिया।अधिकारियों पर कानूनी कार्यवाही तो दूर, जांच में दोषी पाए लोगों को भी बचा लिया  गया।  

निलंबित अधिकारी को बाकायदा सेवानिवृति के ठीक पहले बहाल कर दिया गया वही आयुक्त के नोटशीट पर लिख़ने के बाद भी एक कार्यपालन अभियंता पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। 

इस पूरे मामले में कैसे लीपा पोती की गई, न्यूज़ रिवेटिंग इसका खुलासा जल्द करेगा। 

बहरहाल, हाउसिंग बोर्ड अपनी जिम्मेदारी से बच गया वही रायपुर नगर निगम जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता।नाम  ने  छापने  की  शर्त पर नगरीय प्रशासन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि नगर निगम हाउसिंग बोर्ड के कॉलोनियों को लेने तैयार नहीं था। ऊपर से आए दबाव के कारण उसे ऐसा करना पड़ा क्योंकि एक से डेढ़ लाख नई आबादी के लिए मूलभूत सुविधाएं मुहय्या कराने के लिए न तो उनके पास संसाधन है और ना ही कर्मचारी। 

आलम अब यह है कि हाउसिंग बोर्ड कि कुछ कॉलोनियों में मात्र पांच मिनट पानी के आपूर्ति कि जा रही है वही सफाई और लाइट कि व्यवस्ता पूरी तरह चरमरा गयी है। सेक्टर ८ हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी की स्थिति संवेदनशील है; यहाँ स्ट्रीट लाइट जलाने वाला  कोई कर्मचारी नहीं है। 

पिछले कई दिनों से क्षेत्र में लाइट नहीं जल रही है वहीं यह वही इलाका है यहाँ कुछ माह पूर्व एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ वीभत्स घटना हुई थी जिससे पूरा प्रदेश हिल गया था।

लोगो का मानना है सरकारी एजेंसियो की असंवेदनशीतला के कारण मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के अच्छे कार्यों पर नकारात्मक छवि बन रही है। ऐसा नहीं है रायपुर नगर निगम असहाय हो गए है, उनमे  इच्छा शक्ति का अभाव साफ़ दिख रहा है। 

ऐसा इसलिए क्योंकि कॉलोनी स्थानांतरण के बाद भले ही नगर निगम ने पानी, बिजली और सफाई व्यवस्ता से अपना मुँह मोड़ लिए लेकिन एक माह के अंदर लोगो के घरो में जाकर नियमितीकरण का नोटिस थमाने में कोई संकोच नहीं किया।